दिनकर की रचनाएँ
बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय? लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ? यह नहीं यदि ज्ञात, तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ। (UPSC 2023, 10 Marks, )
बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय? लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ? यह नहीं यदि ज्ञात, तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ।Answer
Explanation
Click Here For Complete Answer
Click Here For Complete Answer
शोषण की शृंखला के हेतु बनती जो शांति, युद्ध है, यथार्थ में, व' भीषण अशांति है; सहना उसे हो मौन, हार मनुजत्व की है, ईश की अवज्ञा घोर, पौरुष की श्रांति है; पातक मनुष्य का है, मरण मनुष्यता का, ऐसी शृंखला में धर्म विप्लव है, क्रांति है। (UPSC 2020, 10 Marks, )
शोषण की शृंखला के हेतु बनती जो शांति, युद्ध है, यथार्थ में, व' भीषण अशांति है; सहना उसे हो मौन, हार मनुजत्व की है, ईश की अवज्ञा घोर, पौरुष की श्रांति है; पातक मनुष्य का है, मरण मनुष्यता का, ऐसी शृंखला में धर्म विप्लव है, क्रांति है।Answer
Explanation
Click Here For Complete Answer
Click Here For Complete Answer
बालहीना माता की पुकार कभी आती, और आता आर्त्तनाद पितृहीन बाल का; आँख पड़ती है जहाँ, हाय वहीं देखता हूँ सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का; बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी, तो भी सुनता हूँ अट्टहास क्रूर काल का; और सोते-जागते में चौंक उठता हूँ, मानो शोणित पुकारता हो अर्जुन के लाल का। (UPSC 2016, 10 Marks, )
बालहीना माता की पुकार कभी आती, और आता आर्त्तनाद पितृहीन बाल का; आँख पड़ती है जहाँ, हाय वहीं देखता हूँ सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का; बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी, तो भी सुनता हूँ अट्टहास क्रूर काल का; और सोते-जागते में चौंक उठता हूँ, मानो शोणित पुकारता हो अर्जुन के लाल का।Answer
Explanation
Click Here For Complete Answer
Click Here For Complete Answer
शांति-बीन तब तक बजती है नहीं सुनिश्चित सुर में, स्वर की शुद्ध प्रतिध्वनि जब तक उठे नहीं उर-उर में। यह न बाह्म उपकरण, भार बन जो आवे ऊपर से, आत्मा की यह ज्योति, फूटती सदा बिमल अंतर से ॥ (UPSC 2014, 10 Marks, )
शांति-बीन तब तक बजती है नहीं सुनिश्चित सुर में, स्वर की शुद्ध प्रतिध्वनि जब तक उठे नहीं उर-उर में। यह न बाह्म उपकरण, भार बन जो आवे ऊपर से, आत्मा की यह ज्योति, फूटती सदा बिमल अंतर से ॥Answer
Explanation
Click Here For Complete Answer
Click Here For Complete Answer
ईश जानें, देश का लज्जा-विषय तत्त्व है कोई कि केवल आवरण उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का जो कि जलती आ रही चिरकाल से स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी नायकों के पेट में जठराग्नि-सी। (UPSC 2013, 10 Marks, )
ईश जानें, देश का लज्जा-विषय तत्त्व है कोई कि केवल आवरण उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का जो कि जलती आ रही चिरकाल से स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी नायकों के पेट में जठराग्नि-सी।Answer
Explanation
Click Here For Complete Answer
Click Here For Complete Answer
“न्यायोचित सुख सुलभ नहीं जब तक मानव-मानव को चैन कहाँ धरती पर, तब तक शान्ति कहाँ इस भव को? जब तक मनुज-मनुज का यह सुख-भाग नहीं सम होगा शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा। (UPSC 2006, 20 Marks, )
“न्यायोचित सुख सुलभ नहीं जब तक मानव-मानव को चैन कहाँ धरती पर, तब तक शान्ति कहाँ इस भव को? जब तक मनुज-मनुज का यह सुख-भाग नहीं सम होगा शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा।Enroll Now
Answer
भूल रहे हो धर्मराज, तुम, अभी हिंस्र भूतल है, खड़ा चतुर्दिक् अहंकार है, खड़ा चतुर्दिक् छल है। में भी हूँ सोचता, जगत से कैसे उठे जिघांसा। किस प्रकार फैले पृथ्वी पर करुणा, प्रेम, अहिंसा। (UPSC 2005, 20 Marks, )
भूल रहे हो धर्मराज, तुम, अभी हिंस्र भूतल है, खड़ा चतुर्दिक् अहंकार है, खड़ा चतुर्दिक् छल है। में भी हूँ सोचता, जगत से कैसे उठे जिघांसा। किस प्रकार फैले पृथ्वी पर करुणा, प्रेम, अहिंसा।Enroll Now
Answer
“चुराता न्याय जो, रण को बुलाता भी वही है; युधिष्ठिर ! स्वत्व की अन्वेषणा पातक नहीं है। नरक उनके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं; न उनके हेतु जो रण में उसे ललकारते हैं।। (UPSC 2002, 20 Marks, )
“चुराता न्याय जो, रण को बुलाता भी वही है; युधिष्ठिर ! स्वत्व की अन्वेषणा पातक नहीं है। नरक उनके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं; न उनके हेतु जो रण में उसे ललकारते हैं।।Enroll Now