कर रही लीलामय आनंद, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त, विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त। काम-मंगल में मंडित श्रेय, सर्ग है इच्छा का परिणाम। तिरस्कृत कर उसको तुम भूल, बनाते हो असफल भवधाम।। (UPSC 1995, 20 Marks, )

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