बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान् अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध।
(UPSC 1995, 20 Marks, )
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बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान् अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध।
(UPSC 1995, 20 Marks, )