“न्यायोचित सुख सुलभ नहीं जब तक मानव-मानव को चैन कहाँ धरती पर, तब तक शान्ति कहाँ इस भव को? जब तक मनुज-मनुज का यह सुख-भाग नहीं सम होगा शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा। (UPSC 2006, 20 Marks, )

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