बाहरी प्रतिबंधों से ही हमारा पूरा शासन नहीं हो सकता — उन सब बातों की रुकावट नहीं हो सकती जिन्हें हमें न करना चाहिए। प्रतिबंध हमारे अंत:करण में होना चाहिए। यह आभ्यंतर प्रतिबंध दो प्रकार का हो सकता है — एक विवेचनात्मक जो प्रयत्नसाध्य होता है, दूसरा मनप्रवृत्यात्मक जो स्वभावज होता है। बुद्धि द्वारा प्रवृत्ति जबरदस्ती रोकी जाती है, पर लज्जा, संकोच आदि की अवस्था में प्राप्त होकर प्रवर्तक मन आप से आप रुकता है, चेष्टाएँ आप से आप शिथिल पड़ जाती हैं।
(UPSC 1995, 20 Marks, )
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बाहरी प्रतिबंधों से ही हमारा पूरा शासन नहीं हो सकता — उन सब बातों की रुकावट नहीं हो सकती जिन्हें हमें न करना चाहिए। प्रतिबंध हमारे अंत:करण में होना चाहिए। यह आभ्यंतर प्रतिबंध दो प्रकार का हो सकता है — एक विवेचनात्मक जो प्रयत्नसाध्य होता है, दूसरा मनप्रवृत्यात्मक जो स्वभावज होता है। बुद्धि द्वारा प्रवृत्ति जबरदस्ती रोकी जाती है, पर लज्जा, संकोच आदि की अवस्था में प्राप्त होकर प्रवर्तक मन आप से आप रुकता है, चेष्टाएँ आप से आप शिथिल पड़ जाती हैं।
(UPSC 1995, 20 Marks, )