तात राम नहि नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहूँ कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपार्सिधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल व्राता। वेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइए माथा, प्रनतारति भंजन रघु नाथा॥ देहू नाथ प्रभु कहूँ वैदेही, भजहू राम विनु हेतु सनेही। सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा। जासु नाम भय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रकट समुझु जियँ रावन॥ (UPSC 2015, 10 Marks, )

तात राम नहि नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहूँ कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपार्सिधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल व्राता। वेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइए माथा, प्रनतारति भंजन रघु नाथा॥ देहू नाथ प्रभु कहूँ वैदेही, भजहू राम विनु हेतु सनेही। सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा। जासु नाम भय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रकट समुझु जियँ रावन॥
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रास नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।। बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषिक्र बर नारी।। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पार्ई।। सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरखि गएँ पुत्ति तबहिं सुखाहीं।। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।। संकर सहस बिष्नु अज लोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।। (UPSC 2000, 20 Marks, )

रास नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।। बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषिक्र बर नारी।। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पार्ई।। सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरखि गएँ पुत्ति तबहिं सुखाहीं।। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।। संकर सहस बिष्नु अज लोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
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स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किये रजाइ कोटि विधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करन वहोंरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जो मनु माना॥ - सानुग पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलौ मैं साथ।। (UPSC 1999, 20 Marks, )

स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किये रजाइ कोटि विधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करन वहोंरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जो मनु माना॥ - सानुग पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलौ मैं साथ।।
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आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहि रघुनाथु।। बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भँवर अबर्त अपारा।। केवट बुध विद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे।। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। (UPSC 1998, 20 Marks, )

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहि रघुनाथु।। बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भँवर अबर्त अपारा।। केवट बुध विद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे।। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
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सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।। काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।। - सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।। (UPSC 1997, 20 Marks, )

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।। काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।। - सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।
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आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ विषम विषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भंवर अवतं अपारा॥ केवट बुध विद्या बड़ नावा। सकर्हिं न खेड एेक नहिं आवा॥ बनचर कोल किरात विचारे। धके विलोकि पथिक हिय हारे॥ आश्रम उदधि मिली जव जाई। मनहुं उठेड अंबुधि अकुलाई॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥ (UPSC 1994, 20 Marks, )

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ विषम विषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भंवर अवतं अपारा॥ केवट बुध विद्या बड़ नावा। सकर्हिं न खेड एेक नहिं आवा॥ बनचर कोल किरात विचारे। धके विलोकि पथिक हिय हारे॥ आश्रम उदधि मिली जव जाई। मनहुं उठेड अंबुधि अकुलाई॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥
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अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भंवर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूप रूप तरु मूला। चली विपति बारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥ मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥ (UPSC 1993, 20 Marks, )

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भंवर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूप रूप तरु मूला। चली विपति बारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥ मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥
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मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।। (UPSC 1992, 20 Marks, )

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।
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बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।। मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ। (UPSC 1990, 20 Marks, )

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।। मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।
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अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥ (UPSC 1987, 20 Marks, )

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥
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जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥ सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥ (UPSC 1986, 20 Marks, )

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥ सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥
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तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीहि उजियारी॥ कहत भरत गन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि गगन रघुराऊ॥ (UPSC 1981, 20 Marks, )

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीहि उजियारी॥ कहत भरत गन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि गगन रघुराऊ॥
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बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। (UPSC 1979, 20 Marks, )

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
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