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बातन्ह मनहि रिझाई सठ जनि घालसि कुल सीख। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥ (UPSC 2023, 10 Marks, )
बातन्ह मनहि रिझाई सठ जनि घालसि कुल सीख। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥View Answer
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बेद पुरान बिहाइ सुपंथ कुमारग कोटि कुचाल चली है। काल कराल, नृपाल कृपालन राज समाज बड़ोई छली है।। बर्न-बिभाग न आस्रम धर्म, ott दुख-दोष-दरिद्र दली है। स्वारथ को परमारथ को कलि राम को नाम प्रताप बली है। (UPSC 2022, 10 Marks, )
बेद पुरान बिहाइ सुपंथ कुमारग कोटि कुचाल चली है। काल कराल, नृपाल कृपालन राज समाज बड़ोई छली है।। बर्न-बिभाग न आस्रम धर्म, ott दुख-दोष-दरिद्र दली है। स्वारथ को परमारथ को कलि राम को नाम प्रताप बली है।View Answer
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धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कही, जोलहा कहौ कोऊ। काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ। तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ। माँगि कै खैबो मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥ (UPSC 2021, 10 Marks, )
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कही, जोलहा कहौ कोऊ। काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ। तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ। माँगि कै खैबो मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥View Answer
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नामु लिये पूतको पुनीत कियो पातकीसु, आरति निवारी “प्रभु पाहि' कहें पीलकी। छलनिको छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पांति कीन्ही लीन आपुमें सुनारी भोड़े भीलकी।। (UPSC 2019, 10 Marks, )
नामु लिये पूतको पुनीत कियो पातकीसु, आरति निवारी “प्रभु पाहि' कहें पीलकी। छलनिको छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पांति कीन्ही लीन आपुमें सुनारी भोड़े भीलकी।।View Answer
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सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया। जाके बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसासन। अंडकोस समेत गिरि कानन। धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन सिखावनु दाता। हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।। (UPSC 2018, 10 Marks, )
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया। जाके बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसासन। अंडकोस समेत गिरि कानन। धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन सिखावनु दाता। हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।View Answer
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ऋषिनारि उधारि कियो सठ केवट मीत पुनीत सुकीर्ति लही। 'निजलोक दियो सबरी खग को कपि थाप्यो सो मालुम है सबही। दससीस विरोध सभीत विभीषण भूप कियो जग लीक रही। करुणानिंधि को भजु रे तुलसी रघुनाथ अनाथ के नाथ सही। (UPSC 2017, 10 Marks, )
ऋषिनारि उधारि कियो सठ केवट मीत पुनीत सुकीर्ति लही। 'निजलोक दियो सबरी खग को कपि थाप्यो सो मालुम है सबही। दससीस विरोध सभीत विभीषण भूप कियो जग लीक रही। करुणानिंधि को भजु रे तुलसी रघुनाथ अनाथ के नाथ सही।View Answer
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तात राम नहि नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहूँ कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपार्सिधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल व्राता। वेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइए माथा, प्रनतारति भंजन रघु नाथा॥ देहू नाथ प्रभु कहूँ वैदेही, भजहू राम विनु हेतु सनेही। सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा। जासु नाम भय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रकट समुझु जियँ रावन॥ (UPSC 2015, 10 Marks, )
तात राम नहि नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहूँ कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपार्सिधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल व्राता। वेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइए माथा, प्रनतारति भंजन रघु नाथा॥ देहू नाथ प्रभु कहूँ वैदेही, भजहू राम विनु हेतु सनेही। सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा। जासु नाम भय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रकट समुझु जियँ रावन॥View Answer
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अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। 'निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्रविं जलु निज हित लागी। जरैँ न पाव देह बिरहागी ॥ (UPSC 2014, 10 Marks, )
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। 'निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्रविं जलु निज हित लागी। जरैँ न पाव देह बिरहागी ॥View Answer
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अंतरजामिहुतें बड़े बाहरजामि हैं राम, जे नाम लियेतें। धावत धेनु पेन्हाइ लवाइ ज्यों बालक-बोलनि कान कियेतें। आपनि बूझि कहै तुलसी कहिबे की न बावरि बात बियेतें। पैज परें प्रहलादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हियेतें।। (UPSC 2012, 12 Marks, )
अंतरजामिहुतें बड़े बाहरजामि हैं राम, जे नाम लियेतें। धावत धेनु पेन्हाइ लवाइ ज्यों बालक-बोलनि कान कियेतें। आपनि बूझि कहै तुलसी कहिबे की न बावरि बात बियेतें। पैज परें प्रहलादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हियेतें।।Enroll Now
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कृसगात ललात जो रोटिन को, घरवात घरें, खुरपा-खरिया। तिन्ह सोने के मेरु-से ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया।। “तुलसी” दुख दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिद को करिया। ताजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया। (UPSC 2009, 20 Marks, )
कृसगात ललात जो रोटिन को, घरवात घरें, खुरपा-खरिया। तिन्ह सोने के मेरु-से ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया।। “तुलसी” दुख दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिद को करिया। ताजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया।Enroll Now
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कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।। तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।। सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।। प्रभु संदेसु सुनत वैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही। (UPSC 2007, 20 Marks, )
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।। तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।। सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।। प्रभु संदेसु सुनत वैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।Enroll Now
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कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।। नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।। कुबलय बिपिन कुंत बनं सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।। जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा। (UPSC 2004, 20 Marks, )
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।। नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।। कुबलय बिपिन कुंत बनं सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।। जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।Enroll Now
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मेरे जाति पाति, न चहौं काहू की जाति पाँति, - मेरे कोऊ काम को, न हौं काहू के काम को। लोक परलोक रघुनाथ ही के हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसी के एक नाम को। अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग, 'साह ही को गोत, गोत होत है गुलाम को’। (UPSC 2003, 20 Marks, )
मेरे जाति पाति, न चहौं काहू की जाति पाँति, - मेरे कोऊ काम को, न हौं काहू के काम को। लोक परलोक रघुनाथ ही के हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसी के एक नाम को। अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग, 'साह ही को गोत, गोत होत है गुलाम को’।Enroll Now
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रास नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।। बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषिक्र बर नारी।। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पार्ई।। सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरखि गएँ पुत्ति तबहिं सुखाहीं।। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।। संकर सहस बिष्नु अज लोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।। (UPSC 2000, 20 Marks, )
रास नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।। बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषिक्र बर नारी।। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पार्ई।। सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरखि गएँ पुत्ति तबहिं सुखाहीं।। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।। संकर सहस बिष्नु अज लोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।Enroll Now
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स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किये रजाइ कोटि विधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करन वहोंरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जो मनु माना॥ - सानुग पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलौ मैं साथ।। (UPSC 1999, 20 Marks, )
स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किये रजाइ कोटि विधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करन वहोंरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जो मनु माना॥ - सानुग पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलौ मैं साथ।।Enroll Now
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आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहि रघुनाथु।। बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भँवर अबर्त अपारा।। केवट बुध विद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे।। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। (UPSC 1998, 20 Marks, )
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहि रघुनाथु।। बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भँवर अबर्त अपारा।। केवट बुध विद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे।। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।Enroll Now
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सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।। काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।। - सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।। (UPSC 1997, 20 Marks, )
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।। काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।। - सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।Enroll Now
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रामवास वन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा। सचिव विरागु विवेक नरेसू। विपिन सुहावन पावन देसू। भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग संपन्न सुराऊ। रामचरन आश्रित चित चाऊ। जीति मोह महिपालु दल सहित विवेक भुआलु। करत अकटंक राज पुर सुख संपदा सुकालु।। (UPSC 1996, 20 Marks, )
रामवास वन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा। सचिव विरागु विवेक नरेसू। विपिन सुहावन पावन देसू। भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग संपन्न सुराऊ। रामचरन आश्रित चित चाऊ। जीति मोह महिपालु दल सहित विवेक भुआलु। करत अकटंक राज पुर सुख संपदा सुकालु।।Enroll Now
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झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जगु, संत कहंत जे अंतु लहा है। ताको सहै सठ! संकट कोटिक, काढ़त दंत, करंत हहा है। जानपनी को गुमान बड़ो, तुलसी के बिचार गँवार महा है। जानकी जीवनु जान न जान्यौ तो जान कहावत जान्यो कहा है॥ (UPSC 1995, 20 Marks, )
झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जगु, संत कहंत जे अंतु लहा है। ताको सहै सठ! संकट कोटिक, काढ़त दंत, करंत हहा है। जानपनी को गुमान बड़ो, तुलसी के बिचार गँवार महा है। जानकी जीवनु जान न जान्यौ तो जान कहावत जान्यो कहा है॥Enroll Now
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आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ विषम विषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भंवर अवतं अपारा॥ केवट बुध विद्या बड़ नावा। सकर्हिं न खेड एेक नहिं आवा॥ बनचर कोल किरात विचारे। धके विलोकि पथिक हिय हारे॥ आश्रम उदधि मिली जव जाई। मनहुं उठेड अंबुधि अकुलाई॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥ (UPSC 1994, 20 Marks, )
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ विषम विषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भंवर अवतं अपारा॥ केवट बुध विद्या बड़ नावा। सकर्हिं न खेड एेक नहिं आवा॥ बनचर कोल किरात विचारे। धके विलोकि पथिक हिय हारे॥ आश्रम उदधि मिली जव जाई। मनहुं उठेड अंबुधि अकुलाई॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥Enroll Now
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प्रेम अमिय मंदरु विरहु भरत पयोधि गँभीर। मथि काढेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुवीर॥ को दृष्टिगत कर गोस्वामी जो के पक्ष को समर्थ ढंग से उद्घाटित कीजिए।। (UPSC 1994, 55 Marks, )
प्रेम अमिय मंदरु विरहु भरत पयोधि गँभीर। मथि काढेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुवीर॥ को दृष्टिगत कर गोस्वामी जो के पक्ष को समर्थ ढंग से उद्घाटित कीजिए।।Enroll Now
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अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भंवर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूप रूप तरु मूला। चली विपति बारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥ मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥ (UPSC 1993, 20 Marks, )
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भंवर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूप रूप तरु मूला। चली विपति बारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥ मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥Enroll Now
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मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।। (UPSC 1992, 20 Marks, )
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।Enroll Now
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बचन बिकार, करतबऊ खुआर, मन बिगत-बिचार, कलिमल को निधानु है। राम को कहाइ, नाम बेचि बेचि खाइ, सेवा संगति न जाइ पाछिलें को उपखानु है। ते हू ‘तुलसी’ को लोग भलो भलो कहैं, ताको दूसरो न हेतु, एक नीके कै निदान है। लोकरीति बिदित बिलोकियत जहाँ तहाँ, स्वामी के सनेह स्वानहू को सनमानु है॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )
बचन बिकार, करतबऊ खुआर, मन बिगत-बिचार, कलिमल को निधानु है। राम को कहाइ, नाम बेचि बेचि खाइ, सेवा संगति न जाइ पाछिलें को उपखानु है। ते हू ‘तुलसी’ को लोग भलो भलो कहैं, ताको दूसरो न हेतु, एक नीके कै निदान है। लोकरीति बिदित बिलोकियत जहाँ तहाँ, स्वामी के सनेह स्वानहू को सनमानु है॥Enroll Now
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बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।। मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ। (UPSC 1990, 20 Marks, )
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।। मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।Enroll Now
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अतरजामिहु तें बढ़ बाहरजामि हैं राम; जे नाम लिये हैं। धावत धेनु पन्हाई लवाई ज्यों बालक बोलनि कान किये तें। आपनि बुझि कहैं 'तुलसो’, कहिये की न बावरी बात दिये तें। बैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें न हियें तें ॥ (UPSC 1989, 20 Marks, )
अतरजामिहु तें बढ़ बाहरजामि हैं राम; जे नाम लिये हैं। धावत धेनु पन्हाई लवाई ज्यों बालक बोलनि कान किये तें। आपनि बुझि कहैं 'तुलसो’, कहिये की न बावरी बात दिये तें। बैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें न हियें तें ॥Enroll Now
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जग जांचिए कोऊ न, जांचिए जो जिय जाँचिए जानकी- जानाहि रे। जेहि जाँचत जाचकता जरि जाइ जो जारति जोर जहानहि रे ॥ गति देखु बिचारि बिभीषन की, अर आनु हिए हनुमानहि रे। तुलसी भजु दारिद-दोष-दन्रानल, संकट-कोटि-कृपानहि रे॥ (UPSC 1988, 20 Marks, )
जग जांचिए कोऊ न, जांचिए जो जिय जाँचिए जानकी- जानाहि रे। जेहि जाँचत जाचकता जरि जाइ जो जारति जोर जहानहि रे ॥ गति देखु बिचारि बिभीषन की, अर आनु हिए हनुमानहि रे। तुलसी भजु दारिद-दोष-दन्रानल, संकट-कोटि-कृपानहि रे॥Enroll Now
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अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥ (UPSC 1987, 20 Marks, )
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥Enroll Now
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जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥ सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥ (UPSC 1986, 20 Marks, )
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥ सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥Enroll Now
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सिला-साप-पाप, गुह गीध को मिलाप, सबरी के पास आप चलि गये हौ सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायक बिभीषन, भरत सभा सादर सनेह सुर-धुनी मैं॥ आलसी-अभागी-अधी-भारत-अनाथपाल, साहेब समर्थ एक नीके मन गुनी मैं। दोष दुख दारिद दलैया दीनबंधु राम, तुलसी न दूसरो दयानिधान दुनी मैं॥ (UPSC 1985, 20 Marks, )
सिला-साप-पाप, गुह गीध को मिलाप, सबरी के पास आप चलि गये हौ सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायक बिभीषन, भरत सभा सादर सनेह सुर-धुनी मैं॥ आलसी-अभागी-अधी-भारत-अनाथपाल, साहेब समर्थ एक नीके मन गुनी मैं। दोष दुख दारिद दलैया दीनबंधु राम, तुलसी न दूसरो दयानिधान दुनी मैं॥Enroll Now
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भूमिपाल, ब्यालंपाल, नाकपाल, लोकपाल कारन कृपालु, में सब के जो का थाह ला। कादर को आदर नाहि काहू के देखियत, सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली॥ तुलसी सुभाय कहैं, नाहीं कछु पच्छपात, कौनै ईस छिये कीस भालु खास माहली। राम ही के द्वारे पे बोलाइ सनमानियत, मोसे दीन दूबरे कुपूत कूर काहली॥ (UPSC 1984, 20 Marks, )
भूमिपाल, ब्यालंपाल, नाकपाल, लोकपाल कारन कृपालु, में सब के जो का थाह ला। कादर को आदर नाहि काहू के देखियत, सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली॥ तुलसी सुभाय कहैं, नाहीं कछु पच्छपात, कौनै ईस छिये कीस भालु खास माहली। राम ही के द्वारे पे बोलाइ सनमानियत, मोसे दीन दूबरे कुपूत कूर काहली॥Enroll Now
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आपु हों आपको नीकेके जानत, रावरो राम ! भरायो गढ़ायो। कीर ज्यों नाम रटे तुलसी सो कहै जग जानकीनाथ पढायो॥ सोई है खेद जो बेट कहै, न घट जन -जो रघुबीर बढ़ायो। हों तो सदा रबर को असवार, तिहारोई नाम गयंद चढ़ायो। (UPSC 1983, 20 Marks, )
आपु हों आपको नीकेके जानत, रावरो राम ! भरायो गढ़ायो। कीर ज्यों नाम रटे तुलसी सो कहै जग जानकीनाथ पढायो॥ सोई है खेद जो बेट कहै, न घट जन -जो रघुबीर बढ़ायो। हों तो सदा रबर को असवार, तिहारोई नाम गयंद चढ़ायो।Enroll Now
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खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी। जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’ बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी। दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥ (UPSC 1982, 20 Marks, )
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी। जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’ बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी। दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥Enroll Now
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तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीहि उजियारी॥ कहत भरत गन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि गगन रघुराऊ॥ (UPSC 1981, 20 Marks, )
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीहि उजियारी॥ कहत भरत गन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि गगन रघुराऊ॥Enroll Now
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बादि बसन बिनु भूषन भारूं। बादि बिरति बिनु ब्रह्म विचारू॥ सरूज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जाय जप जोगा॥ जाँय जीव बिनु देह सुहाई।। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥ जाउं राम पहि आयेसु देहू।। एकहि आंक मोर हित एहू॥ मोहि नृपु करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता' बस कहहूँ॥ (UPSC 1980, 20 Marks, )
बादि बसन बिनु भूषन भारूं। बादि बिरति बिनु ब्रह्म विचारू॥ सरूज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जाय जप जोगा॥ जाँय जीव बिनु देह सुहाई।। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥ जाउं राम पहि आयेसु देहू।। एकहि आंक मोर हित एहू॥ मोहि नृपु करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता' बस कहहूँ॥Enroll Now
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सिय-राम-सरूप अगाध अन्प बिलोचन मीनन को जलु है। श्रुति रामकथा, मुख राम को नाम, हिये पुनि रामहिं को थलु है॥ मति रामहि सो; गति रामहिं सों, रति राम सों, रामहिं को बलु है। सबकी न कहैं तुलसी के मते इतना जग जीवन को फलु है॥ (UPSC 1980, 20 Marks, )
सिय-राम-सरूप अगाध अन्प बिलोचन मीनन को जलु है। श्रुति रामकथा, मुख राम को नाम, हिये पुनि रामहिं को थलु है॥ मति रामहि सो; गति रामहिं सों, रति राम सों, रामहिं को बलु है। सबकी न कहैं तुलसी के मते इतना जग जीवन को फलु है॥Enroll Now
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बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। (UPSC 1979, 20 Marks, )
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।Enroll Now
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