कबीर की रचनाएँ
जग हठवाड़ा स्वाद ठग, माया बेसाँ लाई। रामचरन नीका गही, जिनि जाइ जनम ठगाइ॥ कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँड़। सतगुरु कृपा भई, नहीं तो करती भाँड़॥ (UPSC 2023, 10 Marks, )
जग हठवाड़ा स्वाद ठग, माया बेसाँ लाई। रामचरन नीका गही, जिनि जाइ जनम ठगाइ॥ कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँड़। सतगुरु कृपा भई, नहीं तो करती भाँड़॥Answer
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पीछै लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥ दीपक दीया तेल भरि, बाती दई साँच। पूरा किया बिसाहुणां, बहुरि न आँवौं हाट॥ (UPSC 2022, 10 Marks, )
पीछै लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥ दीपक दीया तेल भरि, बाती दई साँच। पूरा किया बिसाहुणां, बहुरि न आँवौं हाट॥Answer
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कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूनें घर का पाहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव॥ कबीर चित चमंकिया, चहूं दिसि लागी लाइ। हरि सुमिरण हाथूं घड़ा, बेगे लेहु बुझाइ॥ (UPSC 2020, 10 Marks, )
कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूनें घर का पाहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव॥ कबीर चित चमंकिया, चहूं दिसि लागी लाइ। हरि सुमिरण हाथूं घड़ा, बेगे लेहु बुझाइ॥Answer
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जाका गुर भी अंधला, चेला है जा चंध। अंधे अंधा ठेलिया, दृन्यूं कूप पडंत॥ ना गुर मिल्या न सिष भया, लालचि खेल्या दाव। दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥ (UPSC 2019, 10 Marks, )
जाका गुर भी अंधला, चेला है जा चंध। अंधे अंधा ठेलिया, दृन्यूं कूप पडंत॥ ना गुर मिल्या न सिष भया, लालचि खेल्या दाव। दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥Answer
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जौ रोऊँ तौ बल घटे, हँसौं तौ राम रिसाइ। मन ही मांहिं बिसूरणां, ज्यूं घुंण काठहि खाइ॥ हँसि हँसि कन्त न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ। जो हाँसे ही हरि मिले, तौ नहीं दुहागनि होइ॥ (UPSC 2013, 10 Marks, )
जौ रोऊँ तौ बल घटे, हँसौं तौ राम रिसाइ। मन ही मांहिं बिसूरणां, ज्यूं घुंण काठहि खाइ॥ हँसि हँसि कन्त न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ। जो हाँसे ही हरि मिले, तौ नहीं दुहागनि होइ॥Answer
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लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु भार॥ कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥ सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सके, कै साईं कै चित्त॥ (UPSC 2010, 20 Marks, )
लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु भार॥ कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥ सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सके, कै साईं कै चित्त॥Enroll Now
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जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहीं राम। ते नर इस संसार में, उपजि षये बेकाम॥ कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूने घर का पाहुणा, ज्यूं आया त्यूं जाव॥ (UPSC 2009, 20 Marks, )
जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहीं राम। ते नर इस संसार में, उपजि षये बेकाम॥ कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूने घर का पाहुणा, ज्यूं आया त्यूं जाव॥Enroll Now
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माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत।। कबीर सूता क्या करे, उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख।। (UPSC 2008, 20 Marks, )
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत।। कबीर सूता क्या करे, उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख।।Enroll Now
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अंबर कुंजां कुरलियाँ, गरजि भरे सब ताल। जिनि षैं गोबिंद बीछुटे, तिनके कौण हवाल।। चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति।। (UPSC 2006, 20 Marks, )
अंबर कुंजां कुरलियाँ, गरजि भरे सब ताल। जिनि षैं गोबिंद बीछुटे, तिनके कौण हवाल।। चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति।।Enroll Now
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पीछे लागा जाइ था, लोक बेद के साथि। आगैं थें सतगुरं मिल्या, दीपक दीया हाथि। दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवों हट्ट।। (UPSC 2003, 20 Marks, )
पीछे लागा जाइ था, लोक बेद के साथि। आगैं थें सतगुरं मिल्या, दीपक दीया हाथि। दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवों हट्ट।।Enroll Now
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बिरहा बुरहा जिति कहौ, बिरहा है सुलितान। जिस घर बिरहा न संचरै, सो घर सदा मसान।। इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव। लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौ पीव।। (UPSC 2001, 20 Marks, )
बिरहा बुरहा जिति कहौ, बिरहा है सुलितान। जिस घर बिरहा न संचरै, सो घर सदा मसान।। इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव। लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौ पीव।।Enroll Now
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अगनि जो लागी नीर मैं, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि विचारि।। दौ लागी साझर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह. न पालवै, सतगुर गया लगाइ॥ संमदर लागी आगि, नदिया जल कोइला भई। द देखि कबीरा जागि, मंछी रूषां चढ़ि गई।। (UPSC 1999, 20 Marks, )
अगनि जो लागी नीर मैं, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि विचारि।। दौ लागी साझर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह. न पालवै, सतगुर गया लगाइ॥ संमदर लागी आगि, नदिया जल कोइला भई। द देखि कबीरा जागि, मंछी रूषां चढ़ि गई।।Enroll Now
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ना गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव। दुन्यू बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव।। चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं ॥ निस अँधियारी कारणैं, चौरासी लख चंद। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहिं मंद।। (UPSC 1998, 20 Marks, )
ना गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव। दुन्यू बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव।। चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं ॥ निस अँधियारी कारणैं, चौरासी लख चंद। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहिं मंद।।Enroll Now
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बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागे कोइ। राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।। बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव।। सब रग तंत रबाब तन, बिरह बचावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै साईं कै चित्त।। (UPSC 1997, 20 Marks, )
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागे कोइ। राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।। बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव।। सब रग तंत रबाब तन, बिरह बचावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै साईं कै चित्त।।Enroll Now
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पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर। सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कबीर।। अंबर कुंजां कुरलियाँ, 'गरजि भरे सब ताल। जिनषैं गोविंदु बीछुरै, तिनके कौण हवाल।। सुरति समांणी निरति मैं, अजपा माहैं जाप। लेख समाणा अलेख मैं, यूँ आपा माहैं आप।। (UPSC 1996, 20 Marks, )
पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर। सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कबीर।। अंबर कुंजां कुरलियाँ, 'गरजि भरे सब ताल। जिनषैं गोविंदु बीछुरै, तिनके कौण हवाल।। सुरति समांणी निरति मैं, अजपा माहैं जाप। लेख समाणा अलेख मैं, यूँ आपा माहैं आप।।Enroll Now
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सिव सकती दिसि कौंण जु जोवै, पछिम दिस उठै धूरि। जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥ सायर नाहीं सीप बिन, स्वाति बूँद भी नाहिं। कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माँहिं॥ (UPSC 1995, 20 Marks, )
सिव सकती दिसि कौंण जु जोवै, पछिम दिस उठै धूरि। जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥ सायर नाहीं सीप बिन, स्वाति बूँद भी नाहिं। कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माँहिं॥Enroll Now
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सतगुर मार्या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि। अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि। चोपडि मांडी चौहटे, अरध उरव बाजार। कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार ॥ रात्यूँ रूंनी विरहनीं, ज्यू बंचौ कूं कुज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या विरहा पुज ॥ नैनी नीझरि लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूं पिव पिव करों, कवरू मिलहुगे राम ॥ (UPSC 1994, 20 Marks, )
सतगुर मार्या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि। अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि। चोपडि मांडी चौहटे, अरध उरव बाजार। कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार ॥ रात्यूँ रूंनी विरहनीं, ज्यू बंचौ कूं कुज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या विरहा पुज ॥ नैनी नीझरि लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूं पिव पिव करों, कवरू मिलहुगे राम ॥Enroll Now
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सतगुरु की महिमा अनंत अनंत किया उपगार। लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार।। कबीर सुमिरण सार है, और सकल जंजाल। आदि अंति सब सोधिया दूजा देखौं काल॥ आषड़ियाँ झांई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि। जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि।। (UPSC 1993, 20 Marks, )
सतगुरु की महिमा अनंत अनंत किया उपगार। लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार।। कबीर सुमिरण सार है, और सकल जंजाल। आदि अंति सब सोधिया दूजा देखौं काल॥ आषड़ियाँ झांई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि। जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि।।Enroll Now
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पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथ। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथ।। समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई।। अंबर कुँजां कुरलियाँ गरजि भरे सब तल। जिनि पैं गोविद बीछुटे, तिनके कौण हवाल।। (UPSC 1992, 20 Marks, )
पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथ। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथ।। समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई।। अंबर कुँजां कुरलियाँ गरजि भरे सब तल। जिनि पैं गोविद बीछुटे, तिनके कौण हवाल।।Enroll Now
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पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥ अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, तहां पाप पुन्य नहीं छोति॥ हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥ कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज्यू फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )
पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥ अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, तहां पाप पुन्य नहीं छोति॥ हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥ कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज्यू फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥Enroll Now
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सतगुरु बपुरा क्या करे, जे शिषही माँहि चूक। भावै त्यूँ प्रमोद लै, ज्यूं बंसि बजाई फूक ॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ बिरह भुवंगम तन बसै मन्त्र न लागै कोई। राम बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होई।। (UPSC 1990, 20 Marks, )
सतगुरु बपुरा क्या करे, जे शिषही माँहि चूक। भावै त्यूँ प्रमोद लै, ज्यूं बंसि बजाई फूक ॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ बिरह भुवंगम तन बसै मन्त्र न लागै कोई। राम बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होई।।Enroll Now
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कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण। जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥ मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहिं आहि। अब मन रामहिं ह्नै रह्या, सीस नवावौं काहि। चकवी बिछुरी रेन की, आइ मिली परभाति। जों जन बिछुरे राम से, ते दिन मिले न 'राति॥ (UPSC 1989, 20 Marks, )
कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण। जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥ मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहिं आहि। अब मन रामहिं ह्नै रह्या, सीस नवावौं काहि। चकवी बिछुरी रेन की, आइ मिली परभाति। जों जन बिछुरे राम से, ते दिन मिले न 'राति॥Enroll Now
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बिरहा बुरहा जिनी , बिरहा.है सुलतान। जिह घडि विरह न संचरे, सो घट सदा मसान ! चहु तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाऊं। लेखणि करू करंक की, लिखि लिखि राम पठाऊं ॥ हेरत हेरत हे सखी, रह्मा कबीर हिराइ। बूंद समानी समद मैं, सो कत हेरी जाइ ॥ (UPSC 1988, 20 Marks, )
बिरहा बुरहा जिनी , बिरहा.है सुलतान। जिह घडि विरह न संचरे, सो घट सदा मसान ! चहु तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाऊं। लेखणि करू करंक की, लिखि लिखि राम पठाऊं ॥ हेरत हेरत हे सखी, रह्मा कबीर हिराइ। बूंद समानी समद मैं, सो कत हेरी जाइ ॥Enroll Now
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कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई। अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥ कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति। तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति ॥ राम रसाइन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल। कबीर पीवण दुलभ है, मागै सीस कलाल।। (UPSC 1987, 20 Marks, )
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई। अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥ कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति। तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति ॥ राम रसाइन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल। कबीर पीवण दुलभ है, मागै सीस कलाल।।Enroll Now
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कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। हरि साग जिनि बीसरै, छीलर देखि अनंत। नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणा अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥ (UPSC 1986, 20 Marks, )
कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। हरि साग जिनि बीसरै, छीलर देखि अनंत। नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणा अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥Enroll Now
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चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुरु दीन्ही धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर। यहु तन जालौ मसि करौं, लिखौं राम का नाउँ। लेखणि करूँ करंक की, लिखि लिख राम पठाऊँ॥ कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर। तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी सरीर॥ (UPSC 1985, 20 Marks, )
चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुरु दीन्ही धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर। यहु तन जालौ मसि करौं, लिखौं राम का नाउँ। लेखणि करूँ करंक की, लिखि लिख राम पठाऊँ॥ कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर। तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी सरीर॥Enroll Now
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सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति॥ (UPSC 1984, 20 Marks, )
सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति॥Enroll Now
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सुरति ढीकुली लेज ल्यो, मन नित ढोलन हार। कँवल कुवाँ मैं प्रेम रस, पीवै बारंबार॥ गंग जमुन उर अंतरै, सहज सुंनि ल्यौ घाट। तहाँ कबीरै मठ रच्या, मुनि जन जोवैं बाट॥ (UPSC 1983, 20 Marks, )
सुरति ढीकुली लेज ल्यो, मन नित ढोलन हार। कँवल कुवाँ मैं प्रेम रस, पीवै बारंबार॥ गंग जमुन उर अंतरै, सहज सुंनि ल्यौ घाट। तहाँ कबीरै मठ रच्या, मुनि जन जोवैं बाट॥Enroll Now
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चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं॥ सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥ समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई॥ (UPSC 1982, 20 Marks, )
चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं॥ सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥ समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई॥Enroll Now
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दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥ (UPSC 1981, 20 Marks, )
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥Enroll Now
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रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥ अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥ दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥ देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिस्तार। माहैं पाती माहि जल, माहैं पूजणहार॥ (UPSC 1980, 20 Marks, )
रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥ अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥ दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥ देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिस्तार। माहैं पाती माहि जल, माहैं पूजणहार॥Enroll Now
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सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजाये नित्त। और न कोई सुणि सके, के साईं क चित्त॥ समंदरं लागी भ्रागि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि: कबीरा जागि, मंछी रुखा चढ़ि गई॥ मन लागा उन मन्न सौ, गगन पहुंचा जाइ। देख्या चंद बिहुंणां चांदिणां तहां. अलख निरंजनराई॥ गगन गरजि अमृत चवे, कदली कवल प्रकास। तहां कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥ (UPSC 1979, 20 Marks, )
सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजाये नित्त। और न कोई सुणि सके, के साईं क चित्त॥ समंदरं लागी भ्रागि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि: कबीरा जागि, मंछी रुखा चढ़ि गई॥ मन लागा उन मन्न सौ, गगन पहुंचा जाइ। देख्या चंद बिहुंणां चांदिणां तहां. अलख निरंजनराई॥ गगन गरजि अमृत चवे, कदली कवल प्रकास। तहां कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥Enroll Now