स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
(UPSC 2020, 15 Marks, )
Theme:
स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की चुनौतियाँ
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
(UPSC 2020, 15 Marks, )
Theme:
स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की चुनौतियाँ
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
Introduction
स्वातन्त्योत्तर भारत में हिन्दी का संवादी भाषा के रूप में प्रयोग कई चुनौतियों का सामना करता है। गणेश देवी के अनुसार, भाषाई विविधता के कारण हिन्दी को सभी क्षेत्रों में स्वीकार्यता नहीं मिलती। संविधान ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया, परंतु अंग्रेजी का प्रभाव और क्षेत्रीय भाषाओं की मजबूती इसे सीमित करती है। यूनिसेफ की रिपोर्ट इंगित करती है कि शिक्षा और प्रशासन में हिन्दी के प्रयोग में असमानता है, जो इसकी व्यापकता में बाधा उत्पन्न करती है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की चुनौतियाँ
● अंग्रेजी की मानसिक गुलामी वाली प्रवृत्ति: अंग्रेजों के 150 वर्षों के शासन के दौरान उनकी भाषा और संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा। उच्चाधिकारी अंग्रेजी में टिप्पणियाँ और पत्राचार करना विद्वता मानते हैं। यह प्रवृत्ति हिंदी को राजभाषा के रूप में पूर्णतः स्थापित होने में बाधा उत्पन्न करती है।
● प्रयोगशील भाषा का अभाव: समाज में जिन शब्दों और वाक्यों का प्रयोग नहीं होता, वे मृतप्रायः हो जाते हैं। कार्यालयीन हिंदी के निरंतर प्रयोग की आवश्यकता है ताकि पारिभाषिक शब्दावली प्रचलन में आ सके।
● मौलिक सामग्री का अभाव: राजभाषा नीति के क्रियान्वयन में मौलिक सामग्री की कमी एक बड़ी बाधा है। अनूदित साहित्य सहज और ग्राह्य नहीं होता, जिससे अंग्रेजी का अधिक प्रयोग होता है।
● प्रशासकीय परिभाषिक शब्दावली का अभाव: विविध क्षेत्रों की परिभाषिक शब्दावली का अभाव और उसके प्रयोग की अनिच्छा हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने में बाधा है।
● राजभाषा नीति क्रियान्वयन कार्यक्रम की यथोचित समीक्षा का अभाव: सरकार को राजभाषा नीति की समीक्षा कागजी आधार पर नहीं, बल्कि प्रयोगगत आधार पर करनी चाहिए।
● राजभाषा-नीति का दृढ़तापूर्वक परिपालन नहीं: कहीं-कहीं राजभाषा नीति का क्रियान्वयन महज दिखावा होता है। हिंदी दिवस मनाकर हिंदी की निधि हड़प ली जाती है।
● हिंदी विषयक कम्प्यूटर वेबसाइट व सॉफ्टवेयर का अभाव: हिंदी कम्प्यूटरीकृत वेबसाइट और सॉफ्टवेयर की सहज उपलब्धता नहीं होने से कर्मचारी अंग्रेजी को अपनाते हैं।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
● प्रयोगशील भाषा का अभाव: समाज में जिन शब्दों और वाक्यों का प्रयोग नहीं होता, वे मृतप्रायः हो जाते हैं। कार्यालयीन हिंदी के निरंतर प्रयोग की आवश्यकता है ताकि पारिभाषिक शब्दावली प्रचलन में आ सके।
● मौलिक सामग्री का अभाव: राजभाषा नीति के क्रियान्वयन में मौलिक सामग्री की कमी एक बड़ी बाधा है। अनूदित साहित्य सहज और ग्राह्य नहीं होता, जिससे अंग्रेजी का अधिक प्रयोग होता है।
● प्रशासकीय परिभाषिक शब्दावली का अभाव: विविध क्षेत्रों की परिभाषिक शब्दावली का अभाव और उसके प्रयोग की अनिच्छा हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने में बाधा है।
● राजभाषा नीति क्रियान्वयन कार्यक्रम की यथोचित समीक्षा का अभाव: सरकार को राजभाषा नीति की समीक्षा कागजी आधार पर नहीं, बल्कि प्रयोगगत आधार पर करनी चाहिए।
● राजभाषा-नीति का दृढ़तापूर्वक परिपालन नहीं: कहीं-कहीं राजभाषा नीति का क्रियान्वयन महज दिखावा होता है। हिंदी दिवस मनाकर हिंदी की निधि हड़प ली जाती है।
● हिंदी विषयक कम्प्यूटर वेबसाइट व सॉफ्टवेयर का अभाव: हिंदी कम्प्यूटरीकृत वेबसाइट और सॉफ्टवेयर की सहज उपलब्धता नहीं होने से कर्मचारी अंग्रेजी को अपनाते हैं।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
Conclusion
स्वातन्त्योत्तर भारत में हिन्दी के संवादी भाषा के रूप में प्रयोग की चुनौतियाँ विविध हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की विविधता, अंग्रेजी का वर्चस्व और भाषाई राजनीति प्रमुख बाधाएँ हैं। महात्मा गांधी ने कहा था, "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।" संविधान के अनुच्छेद 343-351 में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात की गई है। समाधान के लिए बहुभाषी शिक्षा प्रणाली और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हिन्दी का समन्वय आवश्यक है, जिससे सभी भाषाओं का सम्मान हो सके।