निराला की रचनाएँ
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण, हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर । (UPSC 2025, 10 Marks, )
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण, हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।Answer
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काँपते हुए किसलय, --झरते पराग समुदय,-- गाते खग नव-जीवन-परिचय, तरु मलय-वलय, ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय, --ज्ञात छवि प्रथम स्वीय-- 'जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय। (UPSC 2021, 10 Marks, )
काँपते हुए किसलय, --झरते पराग समुदय,-- गाते खग नव-जीवन-परिचय, तरु मलय-वलय, ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय, --ज्ञात छवि प्रथम स्वीय-- 'जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।Answer
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आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर, रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त, तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन ! (UPSC 2019, 10 Marks, )
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर, रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त, तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन !Answer
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शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़ जल राशि-राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोड़ता बंध-प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष। (UPSC 2016, 10 Marks, )
शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़ जल राशि-राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोड़ता बंध-प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।Answer
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दिल ने कहा--दलित माओं के सब बच्चे अब बागी होंगे अग्निपुत्र होंगे वे, अंतिम विप्लव में सहभागी होंगे दिल ने कहा--अरे यह बच्चा सचमुच अवतारी वराह है इसकी भावी लीलाओं का सारी धरती चरागाह है। (UPSC 2012, 12 Marks, )
दिल ने कहा--दलित माओं के सब बच्चे अब बागी होंगे अग्निपुत्र होंगे वे, अंतिम विप्लव में सहभागी होंगे दिल ने कहा--अरे यह बच्चा सचमुच अवतारी वराह है इसकी भावी लीलाओं का सारी धरती चरागाह है।Enroll Now
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“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार, ही श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल, एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि-राशि "जल पर चढ़ता खाता पछाड़, दर तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा, हो स्फीत-वक्ष, दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।। (UPSC 2009, 20 Marks, )
“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार, ही श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल, एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि-राशि "जल पर चढ़ता खाता पछाड़, दर तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा, हो स्फीत-वक्ष, दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।।Enroll Now
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कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रखा, सहाया जाड़ा-घाम; हाथ जिसके तू लगा, पैर सर रखकर व” पीछे को भगा औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा तभी साधारणों से तू रहा न्यारा। (UPSC 2008, 20 Marks, )
कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रखा, सहाया जाड़ा-घाम; हाथ जिसके तू लगा, पैर सर रखकर व” पीछे को भगा औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा तभी साधारणों से तू रहा न्यारा।Enroll Now
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“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राम का जो नं थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युत्-गति हतचेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन। (UPSC 2007, 20 Marks, )
“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राम का जो नं थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युत्-गति हतचेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।Enroll Now
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बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक-रूप, गुण-गण-अनिन्द्य साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिण-पद् दखिण करतल पर वाम चरण, कपिवर गद्गद। (UPSC 2005, 20 Marks, )
बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक-रूप, गुण-गण-अनिन्द्य साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिण-पद् दखिण करतल पर वाम चरण, कपिवर गद्गद।Enroll Now
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अबे, सुन बे गुलाब, भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब, खून चूसा खाद का तून अशिष्ट, डाल पर इतराता है केपीटलिस्ट! कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रक्खा, सहाय जाड़ा-घाम। (UPSC 2004, 20 Marks, )
अबे, सुन बे गुलाब, भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब, खून चूसा खाद का तून अशिष्ट, डाल पर इतराता है केपीटलिस्ट! कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रक्खा, सहाय जाड़ा-घाम।Enroll Now
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विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी स्नेह-स्वप्न-मगन अमल-कोमल-तनु तरुणी-जुही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल, -पत्रांक में, वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। (‘राग-विराग', निराला, ‘जुही की कली’ से, पृष्ठ 48)। (UPSC 2000, 20 Marks, )
विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी स्नेह-स्वप्न-मगन अमल-कोमल-तनु तरुणी-जुही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल, -पत्रांक में, वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। (‘राग-विराग', निराला, ‘जुही की कली’ से, पृष्ठ 48)।Enroll Now
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शत-शुद्धि-बोध - सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्र-धर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से, संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खण्डित ! देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक; हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार ! (UPSC 1998, 20 Marks, )
शत-शुद्धि-बोध - सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्र-धर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से, संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खण्डित ! देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक; हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार !Enroll Now
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देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व। (UPSC 1997, 20 Marks, )
देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व।Enroll Now
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'ये अश्रु राम के! आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनंचास, पितापक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प का उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग उठते पहाड़, जल राशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोडता बन्ध प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष। (UPSC 1996, 20 Marks, )
'ये अश्रु राम के! आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनंचास, पितापक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प का उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग उठते पहाड़, जल राशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोडता बन्ध प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।Enroll Now
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बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान् अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध। (UPSC 1995, 20 Marks, )
बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान् अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध।Enroll Now
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बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।। (UPSC 1994, 20 Marks, )
बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।।Enroll Now
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देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही। (UPSC 1993, 20 Marks, )
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही।Enroll Now
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जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।। (UPSC 1991, 20 Marks, )
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।।Enroll Now
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फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर। हर पिता-कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर। (UPSC 1990, 20 Marks, )
फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर। हर पिता-कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।Enroll Now
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है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार। (UPSC 1989, 20 Marks, )
है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।Enroll Now
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फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;। (UPSC 1988, 20 Marks, )
फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;।Enroll Now
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देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति— शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग-रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही। (UPSC 1987, 20 Marks, )
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति— शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग-रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही।Enroll Now
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देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर! (UPSC 1986, 20 Marks, )
देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर!Enroll Now
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बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।। (UPSC 1994, 20 Marks, )
बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।।Enroll Now
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देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही। (UPSC 1993, 20 Marks, )
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही।Enroll Now
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जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।। (UPSC 1991, 20 Marks, )
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।।Enroll Now
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फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर। हर पिता-कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर। (UPSC 1990, 20 Marks, )
फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर। हर पिता-कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।Enroll Now
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है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार। (UPSC 1989, 20 Marks, )
है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।Enroll Now
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फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;। (UPSC 1988, 20 Marks, )
फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;।Enroll Now
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देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति— शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग-रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही। (UPSC 1987, 20 Marks, )
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति— शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग-रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही।Enroll Now
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देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर! (UPSC 1986, 20 Marks, )
देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर!Enroll Now
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“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिये सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार, प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राय का जो न थका जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युत-गति हत चेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन। (UPSC 1984, 20 Marks, )
“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिये सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार, प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राय का जो न थका जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युत-गति हत चेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।Enroll Now
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स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय; जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रांत,— एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रांत, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार। (UPSC 1983, 20 Marks, )
स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय; जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रांत,— एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रांत, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।Enroll Now
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है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। (UPSC 1982, 20 Marks, )
है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।Enroll Now
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शत-शुद्धि-बोध—सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खंडित! (UPSC 1980, 20 Marks, )
शत-शुद्धि-बोध—सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खंडित!Enroll Now
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शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।। (UPSC 1979, 20 Marks, )
शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।।Enroll Now