वह संसार के सुख-दुःख अनुभव करता है। अनुभूति और विचार ही उसकी शक्ति है। उस अनुभूति का ही आदान-प्रदान वह देवी से कर सकता है। वह संसार के धूल-धूसरित मार्ग का पथिक है। उस मार्ग पर देवी के नारीत्व की कामना में वह अपना पुरुषत्व अर्पण करता है। वह आश्रय का आदान-प्रदान चाहता है। (UPSC 2024, 10 Marks, )
वह संसार के सुख-दुःख अनुभव करता है। अनुभूति और विचार ही उसकी शक्ति है। उस अनुभूति का ही आदान-प्रदान वह देवी से कर सकता है। वह संसार के धूल-धूसरित मार्ग का पथिक है। उस मार्ग पर देवी के नारीत्व की कामना में वह अपना पुरुषत्व अर्पण करता है। वह आश्रय का आदान-प्रदान चाहता है।View Answer
Introduction
Read
More
परलोक में अधिक भोग का अवसर पाने की कामना से किया गया यह त्याग त्याग नहीं। तुम्हारी आशा और विश्वास के अनुसार यह त्याग भोग की आशा का मूल्य है, भोग की इच्छा है तो साधन रहते भोग करो। (UPSC 2022, 10 Marks, )
परलोक में अधिक भोग का अवसर पाने की कामना से किया गया यह त्याग त्याग नहीं। तुम्हारी आशा और विश्वास के अनुसार यह त्याग भोग की आशा का मूल्य है, भोग की इच्छा है तो साधन रहते भोग करो।View Answer
Introduction
Read
More
जिसे तुम नाश कहती हो, वह केवल परिवर्तन है। अमरता का अर्थ है अपरिवर्तन। कल्पना करो, संसार में कोई भी परिवर्तन न हो? उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा? (UPSC 2021, 10 Marks, )
जिसे तुम नाश कहती हो, वह केवल परिवर्तन है। अमरता का अर्थ है अपरिवर्तन। कल्पना करो, संसार में कोई भी परिवर्तन न हो? उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा?View Answer
Introduction
Read
More
आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें बुदबुदा मात्र है। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है। (UPSC 2017, 10 Marks, )
आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें बुदबुदा मात्र है। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है।View Answer
Introduction
Read
More
दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है? (UPSC 2016, 10 Marks, )
दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है?View Answer
Introduction
Read
More
मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा। (UPSC 2016, 10 Marks, )
मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा।View Answer
Introduction
Read
More
स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी। (UPSC 2015, 10 Marks, )
स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी।View Answer
Introduction
Read
More
मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये। (UPSC 2012, 12 Marks, )
मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये।Enroll Now
Introduction
Enroll Now
जन-सागर इस घोषणा के झंझावात से तरंगित हो उठा। जन-समूह की ग्रीवाएँ उठ गयीं और दृष्टि मार्ग के पश्चिम छोर की ओर चली गयी। दीपदण्ड-धारी अश्वारोहियों के पीछे रथ चले आ रहे थे और रथों के पीछे फिर दीपदण्ड-धारी अश्वारोही। रथ शीघ्र ही मण्डप के समीप जन-प्रवाह में आ पहुँचे। (UPSC 2012, 12 Marks, )
जन-सागर इस घोषणा के झंझावात से तरंगित हो उठा। जन-समूह की ग्रीवाएँ उठ गयीं और दृष्टि मार्ग के पश्चिम छोर की ओर चली गयी। दीपदण्ड-धारी अश्वारोहियों के पीछे रथ चले आ रहे थे और रथों के पीछे फिर दीपदण्ड-धारी अश्वारोही। रथ शीघ्र ही मण्डप के समीप जन-प्रवाह में आ पहुँचे।Enroll Now
Introduction
Enroll Now
परिवर्तन ही गति है। गति ही जीवन है। अमरता का अर्थ है- अपरिवर्तन, गतिहीनता। देवी, यदि सूर्य जैसे और जहाँ है, वहीँ स्थिर हो जाए? यदि जलवायु जैसे और जहाँ स्थिर हो जाए, सब स्थिर और अपरिवर्तनशील हो जाएँ तो क्या जीवन काम्य और सुखमय होगा? (UPSC 2007, 20 Marks, )
परिवर्तन ही गति है। गति ही जीवन है। अमरता का अर्थ है- अपरिवर्तन, गतिहीनता। देवी, यदि सूर्य जैसे और जहाँ है, वहीँ स्थिर हो जाए? यदि जलवायु जैसे और जहाँ स्थिर हो जाए, सब स्थिर और अपरिवर्तनशील हो जाएँ तो क्या जीवन काम्य और सुखमय होगा?Enroll Now
Introduction
Enroll Now
“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।” (UPSC 2005, 20 Marks, )
“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।”Enroll Now
Introduction
Enroll Now
“जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।” (UPSC 2003, 20 Marks, )
“जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।”Enroll Now
Introduction
Enroll Now
वह संसार के सुख-दुःख अनुभव करता है। अनुभूति और विचार ही उसकी शक्ति है। उस अनुभूति का ही आदान-प्रदान वह देवी से कर सकता है। वह संसार के धूल-धूसरित मार्ग का पथिक है। उस मार्ग पर देवी के नारीत्व की कामना में वह अपना पुरुषत्व अर्पण करता है। वह आश्रय का आदान-प्रदान चाहता है। (UPSC 2024, 10 Marks, )
वह संसार के सुख-दुःख अनुभव करता है। अनुभूति और विचार ही उसकी शक्ति है। उस अनुभूति का ही आदान-प्रदान वह देवी से कर सकता है। वह संसार के धूल-धूसरित मार्ग का पथिक है। उस मार्ग पर देवी के नारीत्व की कामना में वह अपना पुरुषत्व अर्पण करता है। वह आश्रय का आदान-प्रदान चाहता है।View Answer
Introduction
Read
More
परलोक में अधिक भोग का अवसर पाने की कामना से किया गया यह त्याग त्याग नहीं। तुम्हारी आशा और विश्वास के अनुसार यह त्याग भोग की आशा का मूल्य है, भोग की इच्छा है तो साधन रहते भोग करो। (UPSC 2022, 10 Marks, )
परलोक में अधिक भोग का अवसर पाने की कामना से किया गया यह त्याग त्याग नहीं। तुम्हारी आशा और विश्वास के अनुसार यह त्याग भोग की आशा का मूल्य है, भोग की इच्छा है तो साधन रहते भोग करो।View Answer
Introduction
Read
More
जिसे तुम नाश कहती हो, वह केवल परिवर्तन है। अमरता का अर्थ है अपरिवर्तन। कल्पना करो, संसार में कोई भी परिवर्तन न हो? उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा? (UPSC 2021, 10 Marks, )
जिसे तुम नाश कहती हो, वह केवल परिवर्तन है। अमरता का अर्थ है अपरिवर्तन। कल्पना करो, संसार में कोई भी परिवर्तन न हो? उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा?View Answer
Introduction
Read
More
आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें बुदबुदा मात्र है। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है। (UPSC 2017, 10 Marks, )
आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें बुदबुदा मात्र है। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है।View Answer
Introduction
Read
More
दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है? (UPSC 2016, 10 Marks, )
दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है?View Answer
Introduction
Read
More
मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा। (UPSC 2016, 10 Marks, )
मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा।View Answer
Introduction
Read
More
स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी। (UPSC 2015, 10 Marks, )
स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी।View Answer
Introduction
Read
More
मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये। (UPSC 2012, 12 Marks, )
मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये।Enroll Now
Introduction
Enroll Now
जन-सागर इस घोषणा के झंझावात से तरंगित हो उठा। जन-समूह की ग्रीवाएँ उठ गयीं और दृष्टि मार्ग के पश्चिम छोर की ओर चली गयी। दीपदण्ड-धारी अश्वारोहियों के पीछे रथ चले आ रहे थे और रथों के पीछे फिर दीपदण्ड-धारी अश्वारोही। रथ शीघ्र ही मण्डप के समीप जन-प्रवाह में आ पहुँचे। (UPSC 2012, 12 Marks, )
जन-सागर इस घोषणा के झंझावात से तरंगित हो उठा। जन-समूह की ग्रीवाएँ उठ गयीं और दृष्टि मार्ग के पश्चिम छोर की ओर चली गयी। दीपदण्ड-धारी अश्वारोहियों के पीछे रथ चले आ रहे थे और रथों के पीछे फिर दीपदण्ड-धारी अश्वारोही। रथ शीघ्र ही मण्डप के समीप जन-प्रवाह में आ पहुँचे।Enroll Now
Introduction
Enroll Now
परिवर्तन ही गति है। गति ही जीवन है। अमरता का अर्थ है- अपरिवर्तन, गतिहीनता। देवी, यदि सूर्य जैसे और जहाँ है, वहीँ स्थिर हो जाए? यदि जलवायु जैसे और जहाँ स्थिर हो जाए, सब स्थिर और अपरिवर्तनशील हो जाएँ तो क्या जीवन काम्य और सुखमय होगा? (UPSC 2007, 20 Marks, )
परिवर्तन ही गति है। गति ही जीवन है। अमरता का अर्थ है- अपरिवर्तन, गतिहीनता। देवी, यदि सूर्य जैसे और जहाँ है, वहीँ स्थिर हो जाए? यदि जलवायु जैसे और जहाँ स्थिर हो जाए, सब स्थिर और अपरिवर्तनशील हो जाएँ तो क्या जीवन काम्य और सुखमय होगा?Enroll Now
Introduction
Enroll Now
“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।” (UPSC 2005, 20 Marks, )
“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।”Enroll Now
Introduction
Enroll Now
“जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।” (UPSC 2003, 20 Marks, )
“जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।”Enroll Now
Introduction
Enroll Now