यशपाल की रचनाएँ

दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है? (UPSC 2016, 10 Marks, )

दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है?
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स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी। (UPSC 2015, 10 Marks, )

स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी।
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“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।” (UPSC 2005, 20 Marks, )

“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।”
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दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है? (UPSC 2016, 10 Marks, )

दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है?
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स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी। (UPSC 2015, 10 Marks, )

स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी।
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“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।” (UPSC 2005, 20 Marks, )

“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।”
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