'शेखर : एक जीवनी'

वेदना के बिना ज्ञान नहीं है, तभी तो ज्ञान अपौरुषेय है — पुरुष की बुद्धि में वह नहीं पाया जाता, वेदना में, तपस्या में, वह उदित होता है। वह मंथन से मिलने वाला अमृत नहीं है, वह अवतीर्ण होने वाला कोई अप्रमेय है... इसी तरह पीड़ा की तपस्या से सहसा जाग कर उन्होंने प्रज्ञा के बोझ से लड़खड़ाकर कहा होगा, अपौरुषेय! अपौरुषेय! (शेखर)। (UPSC 1979, 20 Marks, )

वेदना के बिना ज्ञान नहीं है, तभी तो ज्ञान अपौरुषेय है — पुरुष की बुद्धि में वह नहीं पाया जाता, वेदना में, तपस्या में, वह उदित होता है। वह मंथन से मिलने वाला अमृत नहीं है, वह अवतीर्ण होने वाला कोई अप्रमेय है... इसी तरह पीड़ा की तपस्या से सहसा जाग कर उन्होंने प्रज्ञा के बोझ से लड़खड़ाकर कहा होगा, अपौरुषेय! अपौरुषेय! (शेखर)।
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मृत्यु के भटके हुए उदास पैर द्वार-द्वार पर जाते हैं, और यौवन मुरझा जाता है, और जीवन धुल जाता है, और वेदना है अनन्त... एक नीरवता का क्षण आता है; जिसमें उन श्याम पंखों की उड़ान का रव सुन पड़ता है, जिन्हें देखना सो जाना है... हर कोई ऊँघता है और सो जाता है, हर व्यक्ति और हर वस्तु : केवल यह तृप्त न होने वाली भूख, यह किसी चरम ध्येय की पागल माँग, यह मुक्ति का विवश आकर्षण, यह नहीं बस होता... मृत्यु के पंख उस पर से बीत जाते हैं, लेकिन उनकी छाया उसे नहीं ग्रसती, वैसा ही उद्दीप्त छोड़ जाती है...। (UPSC 1987, 20 Marks, )

मृत्यु के भटके हुए उदास पैर द्वार-द्वार पर जाते हैं, और यौवन मुरझा जाता है, और जीवन धुल जाता है, और वेदना है अनन्त... एक नीरवता का क्षण आता है; जिसमें उन श्याम पंखों की उड़ान का रव सुन पड़ता है, जिन्हें देखना सो जाना है... हर कोई ऊँघता है और सो जाता है, हर व्यक्ति और हर वस्तु : केवल यह तृप्त न होने वाली भूख, यह किसी चरम ध्येय की पागल माँग, यह मुक्ति का विवश आकर्षण, यह नहीं बस होता... मृत्यु के पंख उस पर से बीत जाते हैं, लेकिन उनकी छाया उसे नहीं ग्रसती, वैसा ही उद्दीप्त छोड़ जाती है...।
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इस कहानी में देखो, "धर्म संस्कृति का आदर्श नियम है, इसलिए धर्म की बुराइयाँ संस्कृति में पैदा होती हैं, इसलिए संस्कृति बुरी है" — यह केवल तर्कना-शक्ति का, नट का तमाशा है। संस्कृति की बुराई अगर हमें दिखती है, तो संस्कृति में स्पष्ट देखनी होगी, इस प्रकार दूर से सिद्ध नहीं करनी होगी। नहीं तो, अच्छा कुछ है ही नहीं, बुराई ही बुराई है, और यह हमारी अशांति भी तो उस बुराई में पैदा हुआ मनोविकार है: मानव बुरा होकर अच्छी बात सोच कैसे सकता है? आप अन्धकार दूर करना चाहें तो यही कर सकते हैं कि रोशनी जला दें, यह नहीं कर सकते कि अन्धकार का अधियारापन मिटा दें। (UPSC 1986, 20 Marks, )

इस कहानी में देखो, "धर्म संस्कृति का आदर्श नियम है, इसलिए धर्म की बुराइयाँ संस्कृति में पैदा होती हैं, इसलिए संस्कृति बुरी है" — यह केवल तर्कना-शक्ति का, नट का तमाशा है। संस्कृति की बुराई अगर हमें दिखती है, तो संस्कृति में स्पष्ट देखनी होगी, इस प्रकार दूर से सिद्ध नहीं करनी होगी। नहीं तो, अच्छा कुछ है ही नहीं, बुराई ही बुराई है, और यह हमारी अशांति भी तो उस बुराई में पैदा हुआ मनोविकार है: मानव बुरा होकर अच्छी बात सोच कैसे सकता है? आप अन्धकार दूर करना चाहें तो यही कर सकते हैं कि रोशनी जला दें, यह नहीं कर सकते कि अन्धकार का अधियारापन मिटा दें।
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मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोहबुद्धि परिस्थितियों के संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि देव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है। यदि बाहरी होती, परकीय होती, तो हम उसे देव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। ......। (UPSC 1985, 20 Marks, )

मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोहबुद्धि परिस्थितियों के संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि देव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है। यदि बाहरी होती, परकीय होती, तो हम उसे देव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। ......।
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मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं ! विद्रोह बुद्धि परिस्थितियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती ! वह आत्मा की कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। (UPSC 1980, 20 Marks, )

मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं ! विद्रोह बुद्धि परिस्थितियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती ! वह आत्मा की कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो।
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उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह्‌ गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न। (UPSC 1990, 20 Marks, )

उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह्‌ गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न।
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