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“सभी संस्थाओं के प्रति, समस्त रीतियों के प्रति, जीवन मात्र के प्रति विद्रोह क्रांतिकारी की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।” - इस कथन के आलोक में शेखर के चरित्र की समीक्षा कीजिए। (UPSC 1998, 55 Marks, )
“सभी संस्थाओं के प्रति, समस्त रीतियों के प्रति, जीवन मात्र के प्रति विद्रोह क्रांतिकारी की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।” - इस कथन के आलोक में शेखर के चरित्र की समीक्षा कीजिए।Enroll Now
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“'शेखर : एक जीवनी' व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समाज के मध्य अन्तरद्वन्द्व और संघर्ष की कहानी है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए। (UPSC 1997, 55 Marks, )
“'शेखर : एक जीवनी' व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समाज के मध्य अन्तरद्वन्द्व और संघर्ष की कहानी है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।Enroll Now
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“शेखर में मानवता के संचित अनुभव के प्रकाश में ईमानदारी से अपने को पहचानने की कोशिश है।” - पक्ष अथवा विपक्ष में अपना मंतव्य स्पष्ट कीजिए। (UPSC 1995, 55 Marks, )
“शेखर में मानवता के संचित अनुभव के प्रकाश में ईमानदारी से अपने को पहचानने की कोशिश है।” - पक्ष अथवा विपक्ष में अपना मंतव्य स्पष्ट कीजिए।Enroll Now
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शेखर का जीवन-दर्शन स्वातंत्र्य की खोज है — निर्धारित उपन्यास को दृष्टिगत कर अज्ञेय की स्वातंत्र्य-विषयक अवधारणा शेखर के वितरित जीवन के माध्यम से स्पष्ट कीजिए। (UPSC 1994, 55 Marks, )
शेखर का जीवन-दर्शन स्वातंत्र्य की खोज है — निर्धारित उपन्यास को दृष्टिगत कर अज्ञेय की स्वातंत्र्य-विषयक अवधारणा शेखर के वितरित जीवन के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।Enroll Now
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‘शेखर एक जीवनी व्यक्ति का अभिन्नतम दस्तावेज होने के साथ-साथ उसके युग सन्दर्भ का प्रतिबिम्ब भी है।’ इस कथन की तर्कसम्मत समीक्षा कीजिए। (UPSC 1992, 55 Marks, )
‘शेखर एक जीवनी व्यक्ति का अभिन्नतम दस्तावेज होने के साथ-साथ उसके युग सन्दर्भ का प्रतिबिम्ब भी है।’ इस कथन की तर्कसम्मत समीक्षा कीजिए।Enroll Now
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“शेखर मूलतः और अंततः एक व्यक्तित्व की खोज है, एक व्यक्तित्व का उसके अपने साथ साक्षात्कार है।” ‘शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर इस कथन की युक्तियुक्त समीक्षा कीजिए। (UPSC 1989, 55 Marks, )
“शेखर मूलतः और अंततः एक व्यक्तित्व की खोज है, एक व्यक्तित्व का उसके अपने साथ साक्षात्कार है।” ‘शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर इस कथन की युक्तियुक्त समीक्षा कीजिए।Enroll Now
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“शेखर के विद्रोही व्यक्तित्व का प्रेरक तत्व काम-भावना है।” क्या आप इस टिप्पणी से सहमत हैं? 'शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर विचार कीजिए। (UPSC 1985, 55 Marks, )
“शेखर के विद्रोही व्यक्तित्व का प्रेरक तत्व काम-भावना है।” क्या आप इस टिप्पणी से सहमत हैं? 'शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर विचार कीजिए।Enroll Now
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मूर्ति का निर्माण हो सकता है, मृत्तिका का नहीं! उसी मिट्टी से अच्छी प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है, बुरी भी, पर जहाँ मिट्टी ही न हो, वहाँ कितने ही प्रचार से, कितनी भी शिक्षा से, कितने भी जाज्वल्यमान बलिदान से मूर्ति नहीं बन सकती। (शेखर)। (UPSC 1981, 20 Marks, )
मूर्ति का निर्माण हो सकता है, मृत्तिका का नहीं! उसी मिट्टी से अच्छी प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है, बुरी भी, पर जहाँ मिट्टी ही न हो, वहाँ कितने ही प्रचार से, कितनी भी शिक्षा से, कितने भी जाज्वल्यमान बलिदान से मूर्ति नहीं बन सकती। (शेखर)।Enroll Now
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“शेखर के माध्यम से व्यष्टि सत्य के साथ समष्टि सत्य को पाने और दोनों में परस्पर सन्तुलन स्थापित करने की चेष्टा दिखायीं पड़ती है।” इस कथन के आधार पर ‘शेखर : एक जीवनी’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए। (UPSC 1981, 55 Marks, )
“शेखर के माध्यम से व्यष्टि सत्य के साथ समष्टि सत्य को पाने और दोनों में परस्पर सन्तुलन स्थापित करने की चेष्टा दिखायीं पड़ती है।” इस कथन के आधार पर ‘शेखर : एक जीवनी’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए।Enroll Now
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“शेखर एक व्यक्ति का अभिन्नतम निजी दस्तावेज है, यद्यपि वह साथ ही उस व्यक्ति के युग संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है।” — इस कथन की सप्रसंग व्याख्या कीजिए। (UPSC 1980, 55 Marks, )
“शेखर एक व्यक्ति का अभिन्नतम निजी दस्तावेज है, यद्यपि वह साथ ही उस व्यक्ति के युग संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है।” — इस कथन की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।Enroll Now
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वेदना के बिना ज्ञान नहीं है, तभी तो ज्ञान अपौरुषेय है — पुरुष की बुद्धि में वह नहीं पाया जाता, वेदना में, तपस्या में, वह उदित होता है। वह मंथन से मिलने वाला अमृत नहीं है, वह अवतीर्ण होने वाला कोई अप्रमेय है... इसी तरह पीड़ा की तपस्या से सहसा जाग कर उन्होंने प्रज्ञा के बोझ से लड़खड़ाकर कहा होगा, अपौरुषेय! अपौरुषेय! (शेखर)। (UPSC 1979, 20 Marks, )
वेदना के बिना ज्ञान नहीं है, तभी तो ज्ञान अपौरुषेय है — पुरुष की बुद्धि में वह नहीं पाया जाता, वेदना में, तपस्या में, वह उदित होता है। वह मंथन से मिलने वाला अमृत नहीं है, वह अवतीर्ण होने वाला कोई अप्रमेय है... इसी तरह पीड़ा की तपस्या से सहसा जाग कर उन्होंने प्रज्ञा के बोझ से लड़खड़ाकर कहा होगा, अपौरुषेय! अपौरुषेय! (शेखर)।Enroll Now
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मृत्यु के भटके हुए उदास पैर द्वार-द्वार पर जाते हैं, और यौवन मुरझा जाता है, और जीवन धुल जाता है, और वेदना है अनन्त... एक नीरवता का क्षण आता है; जिसमें उन श्याम पंखों की उड़ान का रव सुन पड़ता है, जिन्हें देखना सो जाना है... हर कोई ऊँघता है और सो जाता है, हर व्यक्ति और हर वस्तु : केवल यह तृप्त न होने वाली भूख, यह किसी चरम ध्येय की पागल माँग, यह मुक्ति का विवश आकर्षण, यह नहीं बस होता... मृत्यु के पंख उस पर से बीत जाते हैं, लेकिन उनकी छाया उसे नहीं ग्रसती, वैसा ही उद्दीप्त छोड़ जाती है...। (UPSC 1987, 20 Marks, )
मृत्यु के भटके हुए उदास पैर द्वार-द्वार पर जाते हैं, और यौवन मुरझा जाता है, और जीवन धुल जाता है, और वेदना है अनन्त... एक नीरवता का क्षण आता है; जिसमें उन श्याम पंखों की उड़ान का रव सुन पड़ता है, जिन्हें देखना सो जाना है... हर कोई ऊँघता है और सो जाता है, हर व्यक्ति और हर वस्तु : केवल यह तृप्त न होने वाली भूख, यह किसी चरम ध्येय की पागल माँग, यह मुक्ति का विवश आकर्षण, यह नहीं बस होता... मृत्यु के पंख उस पर से बीत जाते हैं, लेकिन उनकी छाया उसे नहीं ग्रसती, वैसा ही उद्दीप्त छोड़ जाती है...।Enroll Now
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इस कहानी में देखो, "धर्म संस्कृति का आदर्श नियम है, इसलिए धर्म की बुराइयाँ संस्कृति में पैदा होती हैं, इसलिए संस्कृति बुरी है" — यह केवल तर्कना-शक्ति का, नट का तमाशा है। संस्कृति की बुराई अगर हमें दिखती है, तो संस्कृति में स्पष्ट देखनी होगी, इस प्रकार दूर से सिद्ध नहीं करनी होगी। नहीं तो, अच्छा कुछ है ही नहीं, बुराई ही बुराई है, और यह हमारी अशांति भी तो उस बुराई में पैदा हुआ मनोविकार है: मानव बुरा होकर अच्छी बात सोच कैसे सकता है? आप अन्धकार दूर करना चाहें तो यही कर सकते हैं कि रोशनी जला दें, यह नहीं कर सकते कि अन्धकार का अधियारापन मिटा दें। (UPSC 1986, 20 Marks, )
इस कहानी में देखो, "धर्म संस्कृति का आदर्श नियम है, इसलिए धर्म की बुराइयाँ संस्कृति में पैदा होती हैं, इसलिए संस्कृति बुरी है" — यह केवल तर्कना-शक्ति का, नट का तमाशा है। संस्कृति की बुराई अगर हमें दिखती है, तो संस्कृति में स्पष्ट देखनी होगी, इस प्रकार दूर से सिद्ध नहीं करनी होगी। नहीं तो, अच्छा कुछ है ही नहीं, बुराई ही बुराई है, और यह हमारी अशांति भी तो उस बुराई में पैदा हुआ मनोविकार है: मानव बुरा होकर अच्छी बात सोच कैसे सकता है? आप अन्धकार दूर करना चाहें तो यही कर सकते हैं कि रोशनी जला दें, यह नहीं कर सकते कि अन्धकार का अधियारापन मिटा दें।Enroll Now
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मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोहबुद्धि परिस्थितियों के संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि देव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है। यदि बाहरी होती, परकीय होती, तो हम उसे देव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। ......। (UPSC 1985, 20 Marks, )
मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोहबुद्धि परिस्थितियों के संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि देव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है। यदि बाहरी होती, परकीय होती, तो हम उसे देव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। ......।Enroll Now
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मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं ! विद्रोह बुद्धि परिस्थितियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती ! वह आत्मा की कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। (UPSC 1980, 20 Marks, )
मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं ! विद्रोह बुद्धि परिस्थितियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती ! वह आत्मा की कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो।Enroll Now
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उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह् गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न। (UPSC 1990, 20 Marks, )
उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह् गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न।Enroll Now
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