राजेन्द्र यादव की रचनाएँ
और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ..... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं, जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। (UPSC 2020, 10 Marks, )
और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ..... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं, जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता।Answer
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एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा में झुकी हुई वीपिंग 'विलो' की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़-खड़—वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिए खड़ा है—चौड़े, उठे सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो तो जैसे सिमटकर खो जायगा....। (UPSC 2019, 10 Marks, )
एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा में झुकी हुई वीपिंग 'विलो' की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़-खड़—वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिए खड़ा है—चौड़े, उठे सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो तो जैसे सिमटकर खो जायगा....।Answer
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“क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में मेरे सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।'' (UPSC 2019, 10 Marks, )
“क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में मेरे सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।''Answer
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याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता। सिर्फ उस दर्द को याद करती है, जो पहले कभी होता था। तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है। (UPSC 2017, 10 Marks, )
याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता। सिर्फ उस दर्द को याद करती है, जो पहले कभी होता था। तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है।Answer
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और यह राजधानी! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं; बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इन्तजार करने की मजबूरी है। (UPSC 2013, 10 Marks, )
और यह राजधानी! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं; बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इन्तजार करने की मजबूरी है।Answer
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'लीड काइंडली लाइट'—संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झिलमिला रही है जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा-मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है। (UPSC 2012, 12 Marks, )
'लीड काइंडली लाइट'—संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झिलमिला रही है जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा-मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है।Enroll Now
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पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था। (UPSC 2012, 12 Marks, )
पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था।Enroll Now
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दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-सा ऊँघता जान पड़ता था। जब हवा का कोई भूला-भटका झोंका आ जाता था, तब चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर उड़कर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था। किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है—देखो, मैं यहाँ हूँ। (UPSC 2010, 20 Marks, )
दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-सा ऊँघता जान पड़ता था। जब हवा का कोई भूला-भटका झोंका आ जाता था, तब चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर उड़कर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था। किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है—देखो, मैं यहाँ हूँ।Enroll Now
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कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर। (UPSC 1988, 20 Marks, )
कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर।Enroll Now
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मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है। (UPSC 1983, 20 Marks, )
मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है।Enroll Now
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नियमों के अनुसार चलना आसान है और संसार ऐसे व्यक्तियों का आदर भी करता है, जो नियमानुसार चलते हैं। किन्तु जीवन बाध्य नहीं है कि वह आसान हो या आदर की पात्रता दे? जीवन इससे परे है, नियमों में नहीं बंधता और यशोलिप्सा से ऊँचा है..... जो नियमों से नहीं चलते, किन्तु नियमों की मूल प्रेरणा को समझकर अपना नियम स्वयं बनाते हैं, जीवन तो उन्हीं का है। (UPSC 1982, 20 Marks, )
नियमों के अनुसार चलना आसान है और संसार ऐसे व्यक्तियों का आदर भी करता है, जो नियमानुसार चलते हैं। किन्तु जीवन बाध्य नहीं है कि वह आसान हो या आदर की पात्रता दे? जीवन इससे परे है, नियमों में नहीं बंधता और यशोलिप्सा से ऊँचा है..... जो नियमों से नहीं चलते, किन्तु नियमों की मूल प्रेरणा को समझकर अपना नियम स्वयं बनाते हैं, जीवन तो उन्हीं का है।Enroll Now
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और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ..... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं, जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। (UPSC 2020, 10 Marks, )
और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ..... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं, जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता।Answer
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एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा में झुकी हुई वीपिंग 'विलो' की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़-खड़—वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिए खड़ा है—चौड़े, उठे सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो तो जैसे सिमटकर खो जायगा....। (UPSC 2019, 10 Marks, )
एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा में झुकी हुई वीपिंग 'विलो' की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़-खड़—वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिए खड़ा है—चौड़े, उठे सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो तो जैसे सिमटकर खो जायगा....।Answer
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“क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में मेरे सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।'' (UPSC 2019, 10 Marks, )
“क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में मेरे सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।''Answer
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याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता। सिर्फ उस दर्द को याद करती है, जो पहले कभी होता था। तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है। (UPSC 2017, 10 Marks, )
याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता। सिर्फ उस दर्द को याद करती है, जो पहले कभी होता था। तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है।Answer
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और यह राजधानी! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं; बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इन्तजार करने की मजबूरी है। (UPSC 2013, 10 Marks, )
और यह राजधानी! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं; बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इन्तजार करने की मजबूरी है।Answer
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'लीड काइंडली लाइट'—संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झिलमिला रही है जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा-मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है। (UPSC 2012, 12 Marks, )
'लीड काइंडली लाइट'—संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झिलमिला रही है जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा-मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है।Enroll Now
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पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था। (UPSC 2012, 12 Marks, )
पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था।Enroll Now
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दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-सा ऊँघता जान पड़ता था। जब हवा का कोई भूला-भटका झोंका आ जाता था, तब चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर उड़कर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था। किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है—देखो, मैं यहाँ हूँ। (UPSC 2010, 20 Marks, )
दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-सा ऊँघता जान पड़ता था। जब हवा का कोई भूला-भटका झोंका आ जाता था, तब चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर उड़कर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था। किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है—देखो, मैं यहाँ हूँ।Enroll Now
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कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर। (UPSC 1988, 20 Marks, )
कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर।Enroll Now
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मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है। (UPSC 1983, 20 Marks, )
मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है।Enroll Now
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नियमों के अनुसार चलना आसान है और संसार ऐसे व्यक्तियों का आदर भी करता है, जो नियमानुसार चलते हैं। किन्तु जीवन बाध्य नहीं है कि वह आसान हो या आदर की पात्रता दे? जीवन इससे परे है, नियमों में नहीं बंधता और यशोलिप्सा से ऊँचा है..... जो नियमों से नहीं चलते, किन्तु नियमों की मूल प्रेरणा को समझकर अपना नियम स्वयं बनाते हैं, जीवन तो उन्हीं का है। (UPSC 1982, 20 Marks, )
नियमों के अनुसार चलना आसान है और संसार ऐसे व्यक्तियों का आदर भी करता है, जो नियमानुसार चलते हैं। किन्तु जीवन बाध्य नहीं है कि वह आसान हो या आदर की पात्रता दे? जीवन इससे परे है, नियमों में नहीं बंधता और यशोलिप्सा से ऊँचा है..... जो नियमों से नहीं चलते, किन्तु नियमों की मूल प्रेरणा को समझकर अपना नियम स्वयं बनाते हैं, जीवन तो उन्हीं का है।Enroll Now