हा दैव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ ? हैं काल की घातें कि कल की आज हैं बातें कहाँ ? क्या थे तथा अब क्या हुए हम, जानता बस काल है; भगवान् जाने, काल की कैसी निराली चाल है ! (UPSC 2024, 10 Marks, )
हा दैव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ ? हैं काल की घातें कि कल की आज हैं बातें कहाँ ? क्या थे तथा अब क्या हुए हम, जानता बस काल है; भगवान् जाने, काल की कैसी निराली चाल है !View Answer
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जिसकी प्रभा के सामने रवि-तेज भी फीका पड़ा, अध्यात्म-विद्या का यहाँ आलोक फैला था बड़ा! मानस-कमल सबके यहाँ दिन-रात रहते थे खिले, मानो सभी जन ईश की ज्योतिश्छटा में थे मिले॥ (UPSC 2020, 10 Marks, )
जिसकी प्रभा के सामने रवि-तेज भी फीका पड़ा, अध्यात्म-विद्या का यहाँ आलोक फैला था बड़ा! मानस-कमल सबके यहाँ दिन-रात रहते थे खिले, मानो सभी जन ईश की ज्योतिश्छटा में थे मिले॥View Answer
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हम बाहा उन्नति पर कभी मरते न थे संसार में, बस मप्र थे अन्तर्जगत के अमृत-पारावार में। जड़ से हमें क्या, जबकि हम थे नित्य चेतन से मिले, हैं दीप उनके निकट क्या जो पद्म दिनकर से खिले। (UPSC 2013, 10 Marks, )
हम बाहा उन्नति पर कभी मरते न थे संसार में, बस मप्र थे अन्तर्जगत के अमृत-पारावार में। जड़ से हमें क्या, जबकि हम थे नित्य चेतन से मिले, हैं दीप उनके निकट क्या जो पद्म दिनकर से खिले।View Answer
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बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा— है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा ! महिमा तुम्हारी ही जगत में धन्य आशे ! धन्य है, देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम-सा अन्य है।। आशे, तुम्हारे ही भरोसे जी रहे हैं हम सभी, सब कुछ गया पर हाय रे! तुमको न छोड़ेंगे कभी। आशे, तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यह मही, धोखा न दीजो अन्त में, बिनती हमारी है यही। (UPSC 2012, 12 Marks, )
बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा— है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा ! महिमा तुम्हारी ही जगत में धन्य आशे ! धन्य है, देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम-सा अन्य है।। आशे, तुम्हारे ही भरोसे जी रहे हैं हम सभी, सब कुछ गया पर हाय रे! तुमको न छोड़ेंगे कभी। आशे, तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यह मही, धोखा न दीजो अन्त में, बिनती हमारी है यही।Enroll Now
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हम डूबते हैं आप तो अध के अँधेरे कूप में— हैं किन्तु रखना चाहते उनको सती के रूप में। निज दक्षिणांग पुरीष से रखते सदा हम लिप्त हैं, वामांग में चंदन चढ़ाना चाहते, विक्षिप्त है। (UPSC 2008, 20 Marks, )
हम डूबते हैं आप तो अध के अँधेरे कूप में— हैं किन्तु रखना चाहते उनको सती के रूप में। निज दक्षिणांग पुरीष से रखते सदा हम लिप्त हैं, वामांग में चंदन चढ़ाना चाहते, विक्षिप्त है।Enroll Now
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यद्यपि हताहत गात में कुछ सांस अब भी आ रही, पर सोच पूर्वापर दशा मुंह से निकलता है यही— जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्ज्वल हुई सारी मही, था जो जगत का मुकुट, है क्या हाय ! यह भारत वही? अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर मध्य केवल पङ्क है वह राज राज कुबेर अब हा रङ्क का भी रङ्क है। (UPSC 2003, 20 Marks, )
यद्यपि हताहत गात में कुछ सांस अब भी आ रही, पर सोच पूर्वापर दशा मुंह से निकलता है यही— जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्ज्वल हुई सारी मही, था जो जगत का मुकुट, है क्या हाय ! यह भारत वही? अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर मध्य केवल पङ्क है वह राज राज कुबेर अब हा रङ्क का भी रङ्क है।Enroll Now
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यह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है इसके निवासी ‘आर्य्य’ हैं विद्या, कला-कौशल्य सबके जो प्रथम आचार्य्य हैं। सन्तान उनकी आज यद्यपि हम अधोगति में पड़े; पर चिह्न उनको उच्चता के आज भी कुछ हैं खड़े।। (‘भारत-भारती’, मैथिलीशरण गुप्त, ‘अतीत खण्ड’, पद-17, पृष्ठ-15)। (UPSC 2000, 20 Marks, )
यह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है इसके निवासी ‘आर्य्य’ हैं विद्या, कला-कौशल्य सबके जो प्रथम आचार्य्य हैं। सन्तान उनकी आज यद्यपि हम अधोगति में पड़े; पर चिह्न उनको उच्चता के आज भी कुछ हैं खड़े।। (‘भारत-भारती’, मैथिलीशरण गुप्त, ‘अतीत खण्ड’, पद-17, पृष्ठ-15)।Enroll Now
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