अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिन्दी: सम्बन्ध और अंतर
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अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर हैं। अपभ्रंश में अरबी, फारसी, और तुर्की शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में इन भाषाओं से अधिक शब्द आए। प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो वचन (एकवचन और बहुवचन) रह गए। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, अपभ्रंश में क्रियारूपों की जटिलता अधिक थी, जबकि हिन्दी में चार लकार प्रमुख रहे। विद्यापति और कबीर जैसे कवियों के कार्यों में पदक्रम की विविधता दिखती है।
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अपभ्रंश और अवहट्ट मध्यकालीन आर्यभाषा के विकास में महत्वपूर्ण चरण हैं। विद्वानों ने अवहट्ट को अपभ्रंश के बाद की भाषा माना है। दोनों में उच्चारण, व्याकरण और शब्दावली के स्तर पर गहरा संबंध है। कुछ विद्वानों ने इन्हें एक ही माना है। उच्चारण में स्वर और व्यंजन वर्ण समान हैं, जबकि अवहट्ट में 'ए' और 'औ' नई ध्वनियाँ हैं। व्याकरण में संज्ञा के दो वचन और दो लिंग मिलते हैं, और शब्दावली में तदभव शब्द अधिक पाए जाते हैं।
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अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर हैं। अपभ्रंश में अरबी, फारसी, और तुर्की शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में इन भाषाओं से अधिक शब्द आए। प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो वचन (एकवचन और बहुवचन) रह गए। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, अपभ्रंश में क्रियारूपों की जटिलता अधिक थी, जबकि हिन्दी में चार लकार प्रमुख रहे। विद्यापति और कबीर जैसे कवियों के कार्यों में पदक्रम की विविधता दिखती है।
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अपभ्रंश के विविध भाषिक रूपों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ, लेकिन इसका व्यवस्थित अध्ययन कठिन है। रूद्रट ने अपभ्रंश के देशभेदों को भूरिभेद कहा, जो एक ही भाषा के स्वाभाविक भेद थे। राजशेखर के समय तक अपभ्रंश संपर्क भाषा के रूप में पंजाब से गुजरात तक प्रचलित थी। विष्णु धर्मोतरकार के अनुसार, अपभ्रंश के भेदों का अंत नहीं है। अपभ्रंश के साहित्यिक रूपों से हिंदी, गुजराती, मराठी, बांग्ला आदि भाषाओं का विकास हुआ।
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