स्वतंत्रता आन्दोलन में हिन्दी की भूमिका
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स्वाधीनता आंदोलन में हिंदी ने संघर्ष की भाषा के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस की भाषा मानते हुए इसे राष्ट्रीय एकता का माध्यम बताया। बाल गंगाधर तिलक और जवाहरलाल नेहरू ने भी हिंदी के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया। 1925 में हिंदी साहित्य सम्मेलन ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रस्ताव पारित किया, जिससे हिंदी की प्रतिष्ठा और बढ़ी। हिंदी ने स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण का कार्य किया।
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की राष्ट्रीय चेतना की मुखर अभिव्यक्ति हिन्दी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, और महादेवी वर्मा जैसे रचनाकारों के माध्यम से हुई। भारतेंदु ने अपने नाटकों में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को उठाया, जबकि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में ग्रामीण भारत की समस्याओं को चित्रित किया। महादेवी वर्मा की कविताओं में स्वतंत्रता और नारी चेतना की गूंज सुनाई देती है। इन साहित्यकारों ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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भारत के स्वातंत्र्य-संग्राम में राष्ट्रभाषा हिन्दी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। महात्मा गांधी ने हिन्दी को जन-जन की भाषा मानते हुए इसे स्वतंत्रता आंदोलन का माध्यम बनाया। बाल गंगाधर तिलक और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार को राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक बताया। 1925 के कांग्रेस अधिवेशन में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया गया, जिससे यह स्वतंत्रता संग्राम में जनजागृति का सशक्त माध्यम बनी।
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